‘प्रभु श्रीराम आ रहे हैं – क्या हम तैयार हैं?’
दीपावली पर प्रभु श्रीराम के स्वागत के लिए हम सभी अत्यंत उत्सुक होते हैं, और बड़ी लगन से साफ़-सफ़ाई तथा सजावट में जुट जाते हैं। पर यह कैसे पता चले कि विचारों और भावों के स्तर पर भी क्या हम उनके स्वागत के लिए तैयार हैं?
कई वर्ष पहले परम पूज्य ‘नानाजी’ (श्री धर्मेन्द्र मोहन सिन्हा) ने सम्पूर्ण श्रीरामचरितमानस पर ८९ टेप में व्याख्या रिकॉर्ड की थी। ‘उत्तरकाण्ड’ के प्रथम ६ दोहों की व्याख्या में से कुछ बिंदु यहाँ प्रस्तुत हैं। (पूज्य नानाजी की व्याख्या सुनने के लिए यहाँ क्लिक करें।) इनमें श्रीराम के अयोध्या पधारने से पूर्व शरणागत-भक्त भरतजी और गुरुतत्त्व श्रीहनुमानजी के बीच चर्चा का उल्लेख है।
१) कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा [दोहा १(क) से पूर्व चौपाई २ का अंश]
दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ [दोहा १(क) से पूर्व चौपाई ३ का अंश]
भरतजी मानते हैं ‘मुझे तो प्रभु ने कपटी और कुटिल पहचान लिया, पर वे दीनबन्धु हैं।’ उनका आशय यह है कि प्रभु जानते हैं कि अपनी असंख्य कामनाओं और वासनाओं के चक्कर में पड़ा हुआ जीव तो भगवान् से विमुख ही रहता है। परन्तु जब एक बार वह कार्पण्य-भाव से भगवान् की ओर देख लेता है तो भगवान् इसी को उसका सबसे बड़ा गुण मान लेते हैं और यह दैन्यता उनकी कृपा को बरबस खींचने वाला तत्त्व हो जाता है। अतः सर्वप्रथम, हम हृदय में दैन्यता और कार्पण्यता का भाव धारण करें।
२) मोरे जियँ भरोस दृढ़ सोई । मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई ॥ [दोहा १(क) से पूर्व चौपाई ४ का अंश]
भरतजी कहते हैं ‘मेरे हृदय में ऐसा पक्का भरोसा है कि श्रीरामजी अवश्य मिलेंगे, क्योंकि मुझे शकुन बड़े शुभ हो रहे हैं।’ अर्थात् संसार की हर परिस्थिति में जब अनुकूलता या प्रतिकूलता का भाव न होकर केवल अपने मंगल का ही दर्शन हो, तब हम समझें कि अवश्य ही प्रभु के आने का दिन निकट है।
३) राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत। बिप्र रूप धरि पवनसुत आइ गयउ जनु पोत ॥ [दोहा १(क)]
भरतजी का मन श्रीरामजी के विरह-समुद्र में डूब रहा था, तब उसी समय श्रीहनुमानजी वहाँ आ गये। अर्थात् जिस समय भक्त के हृदय में निराशा का उदय होता है, उसी समय गुरु स्वयं प्रकट होकर उसको उबार लेते हैं।
मिले आजु मोहि राम पिरीते [दोहा २ से पूर्व चौपाई ६ का अंश]
गुरु का दर्शन भक्त को ऐसा लगता है जैसे उसके प्यारे प्रभु ही उसको मिल गये हों।
काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो [दोहा २ से पूर्व छंद का अंश]
भक्त के विनम्रता-दैन्यता के भाव में सारे सद्गुण ऐसे समाये रहते हैं जैसे समुद्र में विभिन्न नदियों का जल।
राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह [दोहा २(क) का अंश]
ऐसे भक्त के लिए गुरुतत्त्व संदेश देता है कि आप श्रीरामजी को प्राणों के समान प्रिय हैं।
४) गावत चलिं सिंधुरगामिनी [दोहा ३ से पूर्व चौपाई ३ का अंश]
जब भरतजी ने अयोध्या-वासियों को श्रीरामजी के आगमन की सूचना दी, तब उनके स्वागत के लिए सौभाग्यवती स्त्रियाँ गाते हुए आगे चलीं। यहाँ गज-गामिनी (हथिनी जैसी चाल वाली) सिंदूरगामिनी स्त्रियों का तात्पर्य यह है कि भगवद्-भाव के आगमन के स्वागत में मन की वृत्तियाँ अत्यन्त शान्त हो जाती हैं, उनके अन्दर से चंचलता का सर्वथा नाश हो जाता है।
५) गइ बिषम बिपति बियोगभव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे [दोहा ६ से पूर्व छंद का अंश]
जब माताएँ प्रभु से मिलीं, तब वियोग से उत्पन्न भयानक विपत्ति दूर हो गयी और सबने अपार सुख और हर्ष का अनुभव किया। भगवान् से संपर्क होने का यही लक्षण है कि अपार सुख और हर्ष की प्राप्ति होती है, और सारी विपत्तियाँ दूर हो जाती हैं।
कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई। जब तव सुमिरन भजन न होई ॥ [सुंदरकाण्ड दोहा ३२ से पूर्व चौपाई २]
जब भगवान् का स्मरण या भजन नहीं होता तभी संसार की सारी विपत्तियाँ जीव को घेर लेती हैं। भगवान् का भाव धारण करने का प्रथम लक्षण यह है कि हृदय में प्रसन्नता और उत्फुल्लता छा जाते हैं।
तो आइए, परम पूज्य बाबूजी (श्रीहनुमानप्रसाद पोद्दार ‘भाइजी’), परम पूज्य श्रीराधाबाबा, सभी पूजनीय संतों तथा पूज्य नानाजी से याचना करें कि उनकी कृपा से हम दैन्यता, भगवद्-विश्वास, शान्ति और उत्फुल्लता के भाव धारण कर सकें, अपने मन-मंदिर को प्रभु श्रीराम के स्वागत के लिए तैयार कर सकें।
॥ जय श्रीराम ॥
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